Tuesday, January 24, 2012

नाथूराम गोड़से की अस्थि को अभी तक है विसर्जन का इंतज़ार…

प्रदीप उपाध्याय

महात्मा गाँधी के अस्थि-कलश का विसर्जन बड़े ही समारोहपूर्वक किया गया, लेकिन किपूना में नाथूराम गोड़से का अस्थि-कलश अभी तक रखा हुआ है, वजह उनकी अन्तिम इच्छा का पूरा न होना है।

फ़ाँसी दिये जाने से कुछ ही मिनट पहले नाथूराम गोड़से ने अपने भाई दत्तात्रय को हिदायत देते हुए कहा था, कि “मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धु नदी में ही उस दिन प्रवाहित करना जब सिन्धु नदी एक स्वतन्त्र नदी के रूप में भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमें कितने भी वर्ष लग जायें, कितनी ही पीढ़ियाँ जन्म लें, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना…”। नाथूराम गोड़से और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी राख उनके परिवार वालों को नहीं सौंपी गई थी। जेल अधिकारियों ने अस्थियों और राख से भरा मटका रेल्वे पुल के उपर से घग्गर नदी में फ़ेंक दिया था। दोपहर बाद में उन्हीं जेल कर्मचारियों में से किसी ने बाजार में जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह खबर एक स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई। इन्द्रसेन उस वक्त “द ट्रिब्यून” के कर्मचारी भी थे। शर्मा ने तत्काल दो महासभाईयों को साथ लिया और दुकानदार द्वारा बताई जगह पर पहुँचे। उन दिनों नदी में उस जगह सिर्फ़ छ्ह इंच गहरा ही पानी था, उन्होंने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर स्थानीय कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश कोहल को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे डॉ एलवी परांजपे को नाशिक ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थि-कलश 1965 में नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से तक पहुँचा दिया गया, जब वे जेल से रिहा हुए। फ़िलहाल यह कलश पूना में उनके निवास पर उनकी अन्तिम इच्छा के मुताबिक सुरक्षित रखा हुआ है।

15 नवम्बर 1950 से आज तक प्रत्येक 15 नवम्बर को गोड़से का “शहीद दिवस” मनाया जाता है। सबसे पहले गोड़से और आपटे की तस्वीरों को अखंड भारत की तस्वीर के साथ रखकर फ़ूलमाला पहनाई जाती है। उसके पश्चात जितने वर्ष उनकी मृत्यु को हुए हैं उतने दीपक जलाये जाते हैं और आरती होती है। अन्त में उपस्थित सभी लोग यह सौगन्ध खाते हैं कि वे गोड़से के “अखंड हिन्दुस्तान” के सपने के लिये काम करते रहेंगे। गोपाल गोड़से अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”

हालांकि यह एक छोटा सा कार्यक्रम होता है, और उपस्थितों की संख्या भी कम ही होती है, लेकिन गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोड़से धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोड़से और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य एक हद तक सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।

डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)। गोपाल गोड़से की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोड़से कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”। सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोड़से परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।

चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।

12 जनवरी 1948 को जैसे ही अखबारों के टेलीप्रिंटरों पर यह समाचार आने लगा कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये सरकार पर दबाव बनाने हेतु गाँधी अनशन पर बैठने वाले हैं, उसी वक्त गोड़से और आपटे ने यह तय कर लिया था कि अब गाँधी का वध करना ही है… इसके पहले नोआखाली में हिन्दुओं के नरसंहार के कारण वे पहले से ही क्षुब्ध और आक्रोशित थे। ये दोनों, दिगम्बर बड़गे (जिसे पिस्तौल चलाना आता था), मदनलाल पाहवा (जो पंजाब का एक शरणार्थी था) और विष्णु करकरे (जो अहमदनगर में एक होटल व्यवसायी था), के सम्पर्क में आये।

पहले इन्होंने गांधी वध के लिये 20 जनवरी का दिन तय किया था, गोड़से ने अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में बदलाव किये, एक बार बिरला हाऊस जाकर उन्होंने माहौल का जायजा लिया, पिस्तौल को एक जंगल में चलाकर देख लिया, लेकिन उनके दुर्भाग्य से उस दिन बम तो बराबर फ़ूटा, लेकिन पिस्तौल न चल सकी। मदनलाल पाहवा पकड़े गये (और यदि दिल्ली पुलिस और मुम्बई पुलिस में बराबर तालमेल और खुफ़िया सूचनाओं का लेनदेन होता तो उसी दिन इनके षडयन्त्र का भंडाफ़ोड़ हो गया होता)। बाकी लोग भागकर वापस मुम्बई आ गये, लेकिन जब तय कर ही लिया था कि यह काम होना ही है, तो तत्काल दूसरी ईटालियन मेड 9 एमएम बेरेटा पिस्तौल की व्यवस्था 27 जनवरी को ग्वालियर से की गई। दिल्ली वापस आने के बाद वे लोग रेल्वे के रिटायरिंग रूम में रुके। शाम को आपटे और करकरे ने चांदनी चौक में फ़िल्म देखी और अपना फ़ोटो खिंचवाया, बिरला मन्दिर के पीछे स्थित रिज पर उन्होंने एक बार फ़िर पिस्तौल को चलाकर देखा, वह बेहतरीन काम कर रही थी।

गाँधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड़ में एक ही स्थिर दिमाग वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोड़से। गिरफ़्तार होने के पश्चात गोड़से ने डॉक्टर से उसे एक सामान्य व्यवहार वाला और शांत दिमाग होने का सर्टिफ़िकेट माँगा, जो उसे मिला भी। बाद में जब अदालत में गोड़से की पूरी गवाही सुनी जा रही थी, पुरुषों के बाजू फ़ड़क रहे थे, और स्त्रियों की आँखों में आँसू थे।

बहरहाल, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने और टुकड़े-टुकड़े करके भारत में मिलाने हेतु कई समूह चुपचाप काम कर रहे हैं, उनका मानना है कि इसके लिये साम-दाम-दण्ड-भेद हरेक नीति अपनानी चाहिये। जिस तरह सिर्फ़ साठ वर्षों में एक रणनीति के तहत कांग्रेस, जिसका पूरे देश में कभी एक समय राज्य था, आज सिमट कर कुछ ही राज्यों में रह गई है, उसी प्रकार पाकिस्तान भी एक न एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा और उसे अन्ततः भारत में मिलना होगा, और तब गोड़से का अस्थि विसर्जन किया जायेगा।

Friday, January 20, 2012

अपनों की चीखे भूल गए.....

प्रदीप उपाध्याय

हमारे देश में अपनों के लिए हमदर्दी हो हो लेकिन एक बांग्लादेशी के लिए उसे इतने बेचनी है की हमारे नेता सो नहीं पाते। हालही में एक घटना ने इसको सही साबित किया है। हमारे देश में सीमा पर तेनात बीएसएफ के जवानों को इसलिए निलंबित कर दिया है क्योकि उन्होंने घुसपैठ की कोशिश और गायों की तस्करी कर रहे एक बांग्लादेशी को पकड़ा था

बांग्लादेशी मीडिया ने इस बात को खूब उछाला और हमारे जवानों को खलनायक के रूप में खड़ा कर दिया और उस तस्कर को बेचारा बना कर सब की सहानभूति दिलाने की कोशिश की

मुझे दुःख इस बात का नहीं है कि उस तस्कर को बेचारा बना कर सब की सहानभूति दिलाने की कोशिशें की जा रही है। मुझे दुःख इस बात का है कि हमारे आलाधिकारियों ने अपने ही लोगो को मुलजिम बना कर खड़ा कर दिया।

एक बात और मै अपने देश कि मीडिया से पूछना चाहता हु कि क्या अपने कभी सोचा है पूरी दुनिया मे भारत ही ऐसा देश होगा जहा लोग अपनों का गला इसलिए कट देते है क्योकि उनकी नाक नीचे हो जाये चाहे इसमें उसकी गलती हो हो।

वही बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने भारत से इस घटना की जांच करा कर दोषियों को सजा देने की मांग की है। लेकिन आप को याद होगा कि १९९९ मे बांग्लादेश मे हमारे जवानों की बेरहमी से की गई हत्याएं कर दी थी उस समय तो हमारे देश के नेताओं को और नहीं ही बांग्लादेश के किसी मंत्री को दोषियों को सजा दिने के बारे मे नहीं सुझा।

अगर आप के पास जबाब है तो मुझे जरुर बताये.......

Thursday, September 15, 2011

समय नहीं है हमारे पास


प्रदीप उपाध्याय

चीन ने एक बार फिर से अपने ओकात दिखाते हुए हमारी सीमा में घुसपैठ की है। पिछले महीने एलओएसी को पार कर दो चीनी हेलीकॉप्‍टरों ने लद्दाख क्षेत्र में हमारे कई बंकर तबाह कर दिए। इन हेलीकॉप्‍टरों में सात से आठ चीनी सैनिक सवार थे। हमारे बंकरों को तबाह करने के बाद चीनी सैनिक आराम से वापस लौट गए।

इस मामले का खुलासा लेह जिला प्रशासन द्वारा राज्‍य सरकार को भेजी गयी रिपोर्ट से हुआ है। इस सम्बन्ध में आईटीबीपी ने भी गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट भेज दी है। लेकिन हमारी सेना ने इसी किसी भी घटना से इनकार किया है। भारतीय सेना चीनी सैनिकों की इन हरकत को घुसपैठ नहीं बल्कि एलओएसी के निशान नहीं बनने की वजह से होने वाला अतिक्रमण मानती है।

हालांकि आधिकारिक सूत्रों के अनुसार 25 अगस्‍त को चीन के दो हेलीकॉप्‍टर चुमुर इलाके में एलओएसी के भीतर करीब 200-300 फीट तक घुसे 20 - 25 मिनट तक रुके चीनी भाषा में कुछ लिखा और सेना के बंकरों को क्षतिग्रस्‍त कर अपने देश लौट गए। हालांकि इस इलाके में आईटीबीपी की भी तैनाती है।

बताया जा रहा है कि आईटीबीपी का एक जवान इस जगह से काफी दूर पर खड़ा था, ऐसे में वह कोई जवाबी कार्रवाई नहीं कर सका। चीनी सैनिकों की इस हरकत को आईटीबीपी के जवानों ने दूरबीन के जरिये देखा।

चीन की इस हरकत का सीधा मतलब ये निकलता है कि हमारी सरकार तो भष्टाचार करने में इतनी व्यस्त है कि उस के पास ऐसी घुसपैठ को रोकने के लिए समय नहीं है।

Friday, September 2, 2011

ओछी हुई सरकार



प्रदीप उपाध्याय

अन्ना के आन्दोलन के बाद हुई अपनी किरकिरी को सरकार हजम नहीं कर पा रही है इसी के चलते सरकार ने अन्ना के आन्दोलन की रीड़ रहे लोगो को निशाना बनाना शुरू कर दिया है जिसकी शुरुआत अरविंद केजरीवाल और कवि कुमार विश्वास को आयकर का नोटिस भेज कर की है

सरकार के इशारे पर आयकर विभाग की ओर से अरविंद केजरीवाल पर नौकरी की शर्तें तोड़ने का आरोप लगते हुए 9 लाख रुपये जमा करने के लिए नोटिस भेजा गया है यह एक सोची समझी चल है जिस के जरिये सरकार अपने रास्ते के काटों को साफ करने की कोशिश कर रही है

सरकार के इस दाव पर बोलते हुए केजरीवाल ने कहा है कि उन्होंने नौकरी की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। वो एक नवंबर 2000 से 31 अक्टूबर 2002 तक स्टडी लीव पर था। 1 नवंबर 2002 को नौकरी ज्वाइन कर ली थी और तीन साल बाद फरवरी 2006 में इस्तीफा दिया।

साथ ही उन्होंने आयकर विभाग के सवालों के जवाब देते हुए कहा कि विभाग जीपीएफ से पैसे काटकर भरपाई कर लें और यदि जीपीएफ के पैसे से पूरी वसूली नहीं हो पाती तो बकाया राशि को सरकार माफ कर दे क्योंकि वें जनहित में काम कर रहे हैं।

मै आप को यह बताना चाहूँगा कि केजरीवाल दिल्ली मे भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) मे ज्वाइंट कमिश्नर पद पर थे। जिससे उन्होंने साल 2006 में इस्तीफा दे दिया था। हालांकि, केजरीवाल का इस्तीफा अब तक स्वीकार नहीं किया गया। सरकारी दस्तावेजों में वो आज भी आयकर विभाग के अधिकारी हैं।

वहीँ अन्ना ने कहा कि सरकार उनकी टीम के लोगों को फंसाने की कोशिश करेगी। अन्ना ने अरविंद से कहा कि हमें अपना काम करते रहना है।

आयकर विभाग के इस कदम के बाद सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और कर्नाटक के लोकायुक्त संतोष हेगड़े ने विभाग से सवाल करते हुए पुचा है कि अन्ना के अनशन से पहले आईटी डीपार्टमेंट कहाँ था ? ऐसे समय में नोटिस क्यों भेजा गया। इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।

Monday, August 29, 2011

विशेषाधिकारों के प्रति जागरूक सरकार

प्रदीप उपाध्याय

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अन्ना से हारने के बाद हार की शिकन नेताओ के चहरे पर साफ देखी जा सकती है. तभी तो वे अन्ना की टीम को घेरने की कोशिश कर रही है

इसी सिलसिले में सरकार ने किरण बेदी और अभिनेता ओम पुरी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस जरी कर दिया है।

सरकार का कहना है कि किरण बेदी और अभिनेता ओम पुरी ने रामलीला मैदान में नेताओं पर 'आपत्तिजनक' टिप्‍पणी की है और यह विशेषाधिकार हनन के दायरे में आता है

हमारी सरकार इतनी सक्रिय हो गई है कि संसद के दोनों सदनों में सदस्‍यों ने इनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस भी जारी कर दिया है।

वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी की हमारी सरकार ने किरण बेदी और अभिनेता ओम पुरी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस जारी करने में इतनी फुर्ती दिखाई है कि मानो लग रहा है कि सरकार हर बात पर जागरूक हो गई है

तभी तो माफी मांग लेने के बावजूद ओम पुरी के खिलाफ कई सांसदों ने सोमवार को विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया। लेकिन फिल्‍म अभिनेता अनुपम खेर खुले आम पुरी के समर्थन में आ गए हैं। उन्‍होंने सोशल साइट ट्वि‍टर पर लिखा, 'मैं ओमपुरी के साथ हूं। उन्‍होंने सार्वजनिक तौर पर उसी बात को कहा है जो करोड़ों घरों में हर रोज कही जाती है।'

मै भी उनकी इस बात से सहमत हु कि अगर आप साफ है तो आप को बुरा नहीं लगना चाहिएइस बात से चोर कि दाड़ी में तिनका वाली कहावत सिद्ध होती दिख रही है

दरअसल, रामलीला मैदान में बेदी ने बीते शुक्रवार को एक कपड़े से घूंघट बनाकर नेताओं को दोमुंहा कहा था और कहा था कि वे हमेशा मुखौटा ओढ़े रहते हैं। बेदी ने कहा था कि नेता अलग-अलग मौकों पर मुखौटे बदल कर अलग-अलग बात बोलते हैं। उन्होंने कहा था कि एक मुलाकात में नेताओं ने कुछ कहा, जबकि दूसरी मुलाकात में कुछ और कहा।

जनतंत्र की सबसे बड़ी जीत


प्रदीप उपाध्याय

अन्ना हजारे के अनशन तोड़ते ही सारा देश जीत के जश्न में डूब गया। तिरंगा हाथो में लिए लोगों ने नाच-गाकर जनतंत्र की सबसे बड़ी जीत का जश्न मनाया।

शुक्रवार को जैसे ही संसद में सरकार द्वारा अन्ना हजारे की शर्तों पर लाया गया प्रस्ताव पारित हुआ पूरा देश खुशी से झुमने लगा। देश में दीपावली और होली एक साथ मनाए जाने लगी।

शनिवार शाम को हजारो की तादात में देश प्रेमी इंडिया गेट पर एकजुट हुए और जीत का जश्न मनाया। वहा का माहौल देखकर ऐसा लग रहा था कि मानो सारा देश ही इंडिया गेट पर गया हो।

मैने जब इस माहौल को देखा तो मेरे शरीर मे एक अजीब सी हलचल होने लगी। दिल मे देश प्रेम की एक अलग ही उमंग उठने लगी मै अपने आप को रोक नहीं पाया और शाम बजे से रत ११ बजे तक नाचता रहा। मै अपने आप को स्वर्ग मे महसूस कर रहा था। मैने पहली बार देश मे ऐसा नज़ारा देखा था और अपने भारतीय होने पर गर्व कर रहा था।

अन्ना हजारे ने इसे जनता की जीत बताया है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकपाल पर हमें अभी आधी जीत हासिल हुई है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हमारी जंग अभी जारी रहेगी।

इस जीत ने ये साबित कर दिया कि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोच्च होती है।

Friday, August 19, 2011

अन्ना की आग सरहद पार


प्रदीप उपाध्याय

भ्रष्टाचार के खिलाफ अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठे अन्ना की आंधी सरहद पार तक पहुंच गई है। भारत में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम लोगो में जोश को देख कर तानाशाही झेल रही पाकिस्तानी जनता भी अपने हक़ के लिए आवाज़ उटती नज़र आने लगी है।

पाकिस्तान में जहांगीर अख्तर नाम के एक राजनीतिक कार्यकर्ता ने भी अन्ना की तर्ज पर भ्रष्टाचार और सेना पर हो रहे बेतहाशा खर्च के विरोध में अनशन करने की योजना बनाई है। ये अनशन रमजान के बाद शुरू होगा।

यह अनशन भ्रष्टाचार के खिलाफ और सैन्य खर्च में कटौती करने के लिए संसद में विधेयक लाने की मांग पर केंद्रित होगा। अख्तर के मुताबिक पाकिस्तान में भ्रष्टाचार और उच्च सैन्य बजट दो प्रमुख समस्याएं हैं। इसके आलावा पाकिस्तान आर्थिक संकट, आतंकवाद और राजनीतिक अस्थिरता जैसी कई समस्याओं से जूझ रहा है।

अन्ना के आंदोलन की प्रशंसा करते हुए अख्तर ने कहा कि पाकिस्तान में भ्रष्टाचार भारत से कहीं ज्यादा है। अख्तर चाहते हैं कि पाकिस्तानी संसद में भी भ्रष्टाचार के खिलाफ कानून पारित हो, जिसकी रूपरेखा बहुत हद तक वैसी ही हो, जिस तरह के कानून की मांग भारत में की जा रही है।

उल्लेखनीय है कि भ्रष्टाचार के मामलों की निगरानी करने वाले वश्विक संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2010 की सूची में पाकिस्तान को दुनिया का 34वां सबसे भ्रष्ट देश के ख़िताब से नवाज़ा गया था।